पर्व तिथियों में लिलोतरी(हरी-सब्जियों)का त्याग क्यों ? वैज्ञानिक कारण !
   

           जैन धर्म प्राचीन काल से ही अपनी आहार-विहार तथा आचार विचार की पद्दति के लिए सारे विश्व में प्रसिद्ध है. जैन धर्म का एक-एक सिद्धांत और  आहार-विहार तथा आचार विचार का प्रत्येक नियम संपूर्ण रूप से वैज्ञानिक है . क्योकि ये सब नियम /सिद्धांत किसी सामान्य मनुष्य द्वारा प्रचलित किये गए नहीं है , बल्कि जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर भगवान् श्री महावीर स्वामी ने सम्पूर्ण /निरपेक्ष  ज्ञानस्वरुप केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद , अपने शिष्य परिवार ,साधु -साध्वी समुदाय और अपने अनुयायी स्वरुप श्रावक -श्राविका  और उससे से भी आगे जाकर पुरे मानव जाती तथा सम्पूर्ण सजीव सृष्टी के परम/ श्रेष्ठ कल्याण के लिए बनाए है . 
           
   इन्ही नियमो में एक नियम पर्व तिथियों में लिलोतरी का त्याग है . 

पर्व तिथि  कब कब होती है. 
(१)हर महीने में बारह(12)पर्व तिथी होती है.(दो बीज,दो पांचम,दो आठम,दो अग्यारस,दो चौदस,दो पूनम,दो अमावस्या )
(२)या हर महीने में पांच पर्व तिथी भी मानते है.(सुद पांचम, दो आठम,दो चौदस)
(३)चैत्र व आसो महीने की सुद सातम(७)से पुनम तक के दिन (दो शाश्वती ओली )
(४ )कार्तिक ,फाल्गुन , और अषाढ़ महीने की सुद सातम (७) से पुनम (१५) तक के दिन . 
(५) पर्युषण पर्व के आठ (८) दिन 

अब आगे हम संक्षेप में पर्व तिथी में लिलोतरी त्याग के धार्मिक कारणों को न देखकर ,सिर्फ इसके वैज्ञानिक कारणों पर ध्यान केंद्रित करते है . 

वैज्ञानिक/स्वास्थ्य कारण 
      जो लोग शाकाहारी है उन्हें हरी सब्जियाँ रोज लेने की जरुरत नहीं है, मगर जो मांसाहारी है उन्हें हरी सब्जियाँ लेने की ख़ास जरुरत होती है ,क्योंकि मांसाहारियो के भोजन में मनुष्य शरीर के लिए आव्यश्यक क्षार ,कार्बोहायद्रेट्स, विटामिन नहीं होता है . और मांस वगेरे में रेषे नहीं होते , इस कारण बंधकोश या कब्जियात जैसी बिमारी का भोग बनना पड़ता है . इसलिए  बंधकोश या कब्जियात ना हो जाए उसके लिए उन्हें हरी सब्जिया प्रमाण में लेनी पड़ती है .वैधो के अनुभव के आधार पर यह बात सत्य जानी गयी है जबकी शाकाहारी लोग नियमित हरी सब्जियाँ लेते रहने से उन्हें ऐसी तकलीफ कम ही होती है .इसलिए उन्हें हरी सब्जियाँ नियमित लेने की जरुरत नहीं है . 
      दूसरी बात यह है की हरी सब्जियों में हीमोग्लोबिन (HEMOGLOBIN) भरपूर प्रमाण में होता है. यह तत्व फेफसे में हवा में से आक्सिजन पाकर खून को शुद्ध करता है.मगर प्राणिज द्रव्यों और मांस वगेरे में यह बिलकुल नहीं होता,इससे उनका शरीर फिक्का हो जाता है जबकि शाकाहारी मनुष्यो के शरीर में  हीमोग्लोबिन ज्यादा प्रमाण में होने के कारण उन्हें हरी सब्जियाँ नियमित लेने की खाश जरुरत नहीं होती . 
     आयुर्वेद की दृष्टी से विचार करे तो हरी सब्जियाँ पित्तवर्धक है,और कठोल वायुकारक है.इससे हरी सब्जियाँ ज्यादा प्रमाण में लेने से पित्त का प्रकोप होता है.वह न हो और शरीर में वात,पित्त ,और कफ का प्रमाण बराबर रहे,उसके लिए लगभग तीन दिनों
में एक बार हरी सब्जियों का त्याग और कठोल या दाल का सेवन करना अनिवार्य है.और हमारी पर्व तिथियाँ भी प्राय हर तीन दिनों में एक बार आती है.15 दिनों के अंत में चौदस ,पूनम और चौदस ,अमावस्या ये 2-2 तिथिया साथ में आती है , इसका कारण यही है की 15 दिनों के दरम्यान अगर पित्त थोडा सा भी बढ़ गया हो तो, दो दिन के लगातार हरी सब्जियों के त्याग से प्रमाण बराबर हो जाएगा . 
        कार्तिक ,फाल्गुन , और अषाढ़ महीने की सुद सातम (७) से पुनम (१५) तक के दिन चौमासी अठाई कहलाती है . और बराबर यह समय ऋतुओ का संधिकाल है . इस समय में शरीर में  वात ,पित्त , और कफ के बीच असंतुलन पैदा होता है , आरोग्य खराब होता है . व ज्यादा न बिगड़े और स्वस्थता प्राप्त हो,उसके लिए आहार पर संयम रखना जरुरी है . 
           इसी तरह  चैत्र  व आसो महीने की सुद सातम (७) से पुनम तक के दिन (दो शाश्वती ओली ) की आराधना का समय भी रोगोत्पति के अनुकूल होता है . (इसीलिए कहा गया है की वैध और डॉक्टर के लिए शरद ऋतु  माता समान और वसंत ऋतु पिता समान है, क्योंकि इस समय लोग ज्यादा बीमार पड़ते है. )
           इस समय के दरम्यान कफ और पित्त का प्रकोप ज्यादा होता है इसलिए इन दिनों में ज्ञानी पुरुषों ने आयम्बिल तप द्वारा कफ और पित्त कम हो ऐसी आराधना बताई है . 
           इसलिए धार्मिक ,वैज्ञानिक, स्वास्थ्य , आयुर्वेद की दृष्टी से भी पर्व तिथी में हरी सब्जियों का त्याग करना चाहिए ! 

No comments:

Post a Comment