तप से होवाले लाभ और वैज्ञानिक रहस्य -2
उपवास जैन धर्म का विशिष्ट तप है . इसके मुख्य दो प्रकार है . (अ )तिविहार उपवास (ब )चौविहार उपवास
उपवास जैन धर्म का विशिष्ट तप है . इसके मुख्य दो प्रकार है . (अ )तिविहार उपवास (ब )चौविहार उपवास
जैन उपवास अगले दिन लगभग शाम 6 बजे से शुरु होकर दुसरे दिन सुबह सूर्योदय के 48 मिनिट बाद तक रहता है . यानी लगभग 36 घंटे . इसमें तिविहार उपवास में उपवास के दिन सुबह 10 से सूर्यास्त तक गर्म पानी पी सकते है . और चौविहार उपवास में 36 घंटे दरम्यान पानी भी नहीं पी सकते .
शरीर के लिए आवश्यक वस्तु -:
आहार -:शरीर को टिकाने के लिए नियमित रूप से योग्य प्रमाण में पथ्य आहार लेना जरुरी है .अगर आहार कम लेने में आये अथवा पूर्ण बंद कर दिया जाए तो शरीर कमजोर होता जाता है ,और लम्बे काल में अन्य प्रवतियाँ करने के लिए शरीर असमर्थ बनता है .
पानी -:आहार को पचाने के लिए पानी अत्यंत जरुरी है . शरीर में 75 से 80% पानी होता है .शरीर में झाडे , उल्टी द्वारा पानी कम होने पर झड़प से खून का दबाव घटने लगता है , और शरीर अस्वस्थ बनता है .इससे शरीर का शुष्कीकरण (ए बहुत आवश्यक है .
आक्सिजन (हवा)-: चयापचय (METABOLISM ) की क्रिया के लिए आक्सिजन अति आवश्यक है . आक्सिजन के द्वारा शरीर में चरबी और शक्कर के दहन के द्वारा हमे जरुरी शक्ति ,केलेरी मिलती है .यह आक्सिजन श्वासोश्वास द्वारा हवा में से ही ली जाती है .हवा में लगभग 20% आक्सिजन प्राणवायु होती है . इससे हवा बिना मनुष्य या DEHYDRATION ) रोकने के लिए ग्लुकोझ आदि का पानी देना पड़ता है .इससे पानी भी जीवन टिकाने के लिकोई सजीव प्राणी या वनस्पति भी जिंदा नहीं रह सकते . जबकि पानी बिना कुछ घंटो और आहार बिना कुछ दिनों तक जिंदा रह सकते है . यानि वैज्ञानिक दृष्टी से आहार बिना सिर्फ पानी के आधार पर बहुत दिनों तक जिंदा रह सकते है , जबकि आहार और पानी दोनों के बिना सिर्फ कुछ दिनों, 4 -5 दिनों के उपवास हो सकते है , उससे ज्यादा नहीं .
उपवास से होने वाले फायदे -: उपवास जिस तरह आत्म शुद्धी और आत्म नियंत्रण का साधन है , उसी तरह देह शुद्धी और दैहिक आंतरिक क्रियाओ को नियंत्रित - नियमीत करने का भी साधन है . उपवास करने से शरीर के आंतरिक धन कचरे का निकाल होता है. शरीर में बढे हुए पित्त , कफ , वायु का उपशमन अथवा तो उत्सर्जन होता है , और शरीर शुद्ध होता है .उपवास के दुसरे या तीसरे दिन बहुतो को पित्त की उल्टियाँ होती है . वस्तुत: इन उल्टियो द्वारा शरीर के अंदर का पित्त निकल जाने से शारीरिक शांति का अनुभव होता है .उपवास दरम्यान सिर्फ गर्म किया हुआ पानी पीने से शरीर में रहने वाले अधिक मात्रा के मल का निकाल होता है , और कृमी आदी को खोराक नहीं मिलने से अपने आप बाहर निकल जाते है , तथा कफ हो तो वो भी दूर हो जाता है . इस प्रकार अधिक मात्रा में रहने वाले कफ , पित्त दूर होने से वात ,पित्त ,कफ का नाश होता है .इसलिए 15 दिनों में या एक महीने में कम से कम एक उपवास तो करना ही चाहिए . इसीलिए शास्त्र कार भगवन्तो ने पाक्षिक प्रायश्चित के रूप में एक उपवास करने का विधान किया है .
उपवास में शक्ति कहा से आती है ? -: सामान्य रूप से जैन शास्त्र में दर्शाए अनुचार जो साधु -साध्वी निरंतर तीन य उससे ज्यादा उपवास करते करते है ,ऐसे सत्वशील सयंमी महात्माओं का शरीर देवाधिष्ठित हो जाता है , अथार्त तप आदी में देवी सहाय मिलती है . परन्तु सामान्य गृहस्थ आदी भी जब 8 ,11, 15, 30, 45 उपवास जैसी महान दीर्धकालीन तपश्चर्या करते है ,तब ज्यादातर शारीरिक रीत से अशक्त हो जाता है , फिर भी मनोबल और आत्मबल के आधार पर वे लम्बे समय तक आहार बिना चला सकते है
कितने ही लोग 16- 16 दिनों तक चौविहार उपवास कर सकते है . शरीर विज्ञान और आरोग्य विज्ञानं के सामान्य ज्ञान वाले लोगो को इसमें बहुत आश्चर्य लगता है .मगर इसके बारे में और विचार करने पर लगता है की हमारे शरीर को किसी भी नयी परिस्थिती के अनुकूल होते लगभग तीन दिन लगते है, और ये तीन दिन दरम्यान नयी परिस्थिती का सामना -प्रतिकार करता है . इन तीन दिनों दरम्यान शारीरिक और मानसिक व्यवस्था तंत्र अस्त व्यस्त हो जाता है , मगर इस प्रतिकार को जब बाहर से किसी प्रकार का वापसी जवाब नहीं मिलता तब शरीर नयी परिस्थिती के अनुकूल हो जाता है .
इस सिद्धांत के अनुचार हमारा शरीर सामान्य दिनों में , दिवस दरम्यान लिए हुए आहार पानी में से अपने लिए आवश्यक गर्मी और शक्ति प्राप्त करता है . मगर शरीर में रहती चरबी और ग्लुकोझ आदि का उपयोग नहीं करता , क्योकि हमारा शरीर इस प्रकार का आदी है .इससे जब हम उपवास या आयंबिल वगैरे तपश्चर्या करते है तब हमारा शरीर रोज की तरह बाहर से लिए गए आहार पानी में से शक्ति पाने का प्रयास करता है .मगर बाहर का आहार पानी बंद होने से शरीर अशक्ति ,भूख वगैरे रूप में नयी परिस्थिती का प्रतिकार करता है .इसके जवाब में हमारा मनोबल मजबूत ना हो तो हम पारणा कर लेते है .और अगर हम पारणा ना करे और उपवास वगैरे चालु रखते है तो , हमारा शरीर बाहर से गर्मी और शक्ति पाने के बदले शरीर में रही चरबी और ग्लुकोझ वगैरे में से अपनी आवश्यकता अनुचार गर्मी और शक्ति प्राप्त कर लेता है .इस परिस्थिती का निर्माण होते तीन दिन लगते है . इसलिए लम्बी तपश्चर्या के दरम्यान प्रथम तीन दिन के बाद भुख और अशक्ति नहीं होने का यही कारण है . तीन दिनों दरम्यान शरीर खुद ही अपने लिए वैकल्पिक व्यवस्था कर लेता है .
थोड़े में , जैन धर्म में बताये हुए नवकारसी , चौविहार ,बियासना ,एकासना,आयंबिल ,उपवास वगैरे तप आरोग्य विज्ञानं ( MEDICAL SCIENCE )और शरीर विज्ञानं की दृष्टी से संपूर्ण वैज्ञानिक है और आध्यात्मिक लाभ के साथ साथ शारीरिक तंदुरस्ती में भी बहुत ही फायदेमंद है . जिन्हें नजर अंदाज नहीं करना चाहिए .
आखिर में, अगर धर्म या धार्मिक शब्द से ऐलर्जी हो तो भी विज्ञान और आरोग्य के नाम से भी उपरोक्त तप और नियम का पालन करना चाहिए .
संकलन
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