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तप से होने वाले लाभ और वैज्ञानिक रहस्य !


वैज्ञानिक युग में जैन धर्म के तप की शारीरिक और आरोग्य की दृष्टि से उपयोगिता और लाभ!

वर्षा काल के चार महीने यानी-:
   तप और ताप(बिमारी)में वृधि!    तो                               जमन पर अंकुश करके ज्वर पर अंकुश करे.  

(1 ) रात्रि भोजन त्याग (चौविहार )-:      (अ ) रात्रि के समय ज्यादातर शारीरिक प्रवृति , परिश्रम कम होने के कारण चयापचय (metabolism ) की प्रक्रिया भी कम हो जाने के कारण , रात्रि भोजन करने वाले को ज्यादातर अजीर्ण ,गैस (वायु) आदि रोग होने की संभावना रहती है.       (ब ) रात्रि के समय सुर्य प्रकाश की गैरहाजरी के कारण वातावरण में शुद्र जीव जंतु की उत्पत्ति ,उपद्रव भी ज्यादा रहता है. सूर्य प्रकाश में  ऐसी शक्ति है की वह वातावरण के प्रदुषण और बिन उपयोगी जीव जंतुओ का नाश कर सकता है,और नए जीव जंतुओ की उत्पत्ति रोक सकता है. इसमें भी सूर्योदय के 48  मिनिट बाद और सूर्यास्त के 48 मिनिट पहले ,भोजन करने का जैन शास्त्रों  में विधान है. क्योकि सूर्यास्त समय जीव जन्तुओ का उपद्रव शुरू होता है और सूर्योदय समय जीव जन्तुओ का उपद्रव पूर्ण होने से, इस बीच के समय में जीव जन्तु ज्यादा सख्या में उत्पन्न होते है/दिखाई देते है !
( कई लोग यह तर्क देते है की ,पहले के जमाने में जब लाईट की व्यवस्था नहीं थी तब ठीक था की ,अँधेरे में दिखाई नहीं पड़ने के कारण जीव जंतु का खाने में गिरने की संभावना रहती थी . मगर आज के समय में ऐसा नहीं है . मगर ऐसा तर्क देने वाले शायद खुद को अँधेरे में रखना चाहते है .या वे सूर्य शक्ति से अनजान है.)
(2 ) बियासना -:  इसमें  दिन  (सूर्योदय के 48  मिनिट बाद और सूर्यास्त के  48 मिनिट पहले ) में दो टाइम का भोजन होता है . बियासना करने से खाने पीने की अनियमित्तता , अपच्य ,अयोग्य  आहार का त्याग होता है . गर्म  पानी पीने के कारण आरोग्य की दृष्टि से पानी में रहते जीव  जंतु  द्वारा  किसी प्रकार के रोग  होने की संभावना  नहीं रहती !

(3 ) एकासना -: एकासना  दरम्यान  दिन में सिर्फ एक बार भोजन होता है , दिन में सिर्फ एक बार नियमीत भोजन करने से शरीर के यंत्रो को रात्री  के समय सम्पूर्ण आराम  मिलता है , और शरीर के के यंत्रो को चलाने के लिए खून व आक्सीजन की जरुरत कम पड़ती है , जिससे ह्रदय और फेफड़े पर ज्यादा बोझ नहीं आता और इससे सारे शरीर को अच्छी तरह आराम मिलने पर सुबह के कार्यो में अलग ही स्फूर्ति का अनुभव प्राप्त होता है !
   एकासना  और  बियासना  में आहार अपनी रूचि पूर्वक , मगर जैन शास्त्रों में बताये अनुचार अभक्ष्य ,अपथ्य , तामसी भोजन त्याग करके करते है . इससे मनुष्य अभक्ष्य ,अपथ्य , तामसी प्रकार के आहार से होने वाली विक्रतियो से बचा रहता है !

(4 )आयंबिल -: इस तप से आध्यात्मिक दृष्टी से रसनेन्द्रिय के ऊपर विजय मिल सकती है और जीभ के ऊपर काबू पा सकते है . इससे बाकी चारो इन्द्रियों पर भी काबू पा सकते है . स्वास्थ्य की नजर से , इस तप के कारण शरीर में कफ और पित्त का नाश होता है .क्योकि कफ को उत्पन्न करने वाले घी, दुध ,दही ,गुड ,और मिठाई का इस तप में सम्पूर्ण त्याग होता है .और हरी सब्जियों का भी त्याग होने से पित्त का भी श्रय (नाश )
होता है .
    आयुर्वेद के अनुचार सर्व रोगों का मूल शरीर में उत्पन्न हुई  वात (वायु ), कफ , और पित्त  की विषमता है , और सामान्य  जीवन व्यवहार में हमारे खान -पान के कारण शरीर में कफ,और पित्त  का प्रमाण बढ़ जाता है , और शारीरिक रोग पैदा होते है . इसलिए जहा तक हो सके महीने में  4 -5 आयंबिल अवश्य करने चाहिए . शास्त्र कार भगवन्तो ने भी साल में दो (2 ) बार (चैत्र  और आसो मास ) आयंबिल की  9 -9 दिन  की शाश्वती ओली करने का कहा है . क्योकि  चैत्र  और आसो मास , ये दोनों महीने ऋतुओ के संधिकाल है .और इस संधिकाल  दरम्यान लगभग सब के आरोग्य में फेरफार होता है . इस समय दरम्यान अगर आहार पानी  पथ्य अपथ्य का विवेक ना रखा जाए तो कभी-कभी लम्बे समय के लिए बिमारी का भोग बनना पड़ता है !

(5 ) उपवास -: contd: तप  से होने वाले लाभ और वैज्ञानिक रहस्य - पार्ट -2 

लेखन,संकलन